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इंदौर प्रीमियर को-ऑपरेटिव बैंक के गौरवशाली 106 वर्ष

इन्दौर प्रीमियर को-ऑपरेटिव बैंक लि- (आई-पी-सी-बैंक) 107 वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। यह बैंक 31 मार्च, 1916 को स्थापित होकर जून 1916 से प्रारंभ हुआ। इस बैंक के लिये यह गौरव का विषय है कि इन्दौर रियासत के महाराजा यशवंतराव होलकर इस बैंक के संरक्षक व दानवीर सर सेठ हुकमचंद इसके संस्थापक अध्‍यक्ष तथा सर्वश्री रायबहादुर सरदार माधवराव किबे, श्रीनिवास द्रविड़, एम-बी- रेगे, रामेश्वर पटेल, अध्‍यक्ष रहे हैं ।

आजादी के पूर्व तत्कालीन होल्कर रियासत द्वारा इसी बात को ध्यान में रखते हु, कृषकों के कल्याणार्थ दि इंदौर प्रीमियर को-ऑपरेटिव बैंक की स्थापना की गई। उल्लेखनीय है कि इस बैंक के पंजीयन के पूर्व 22 प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियां पंजीकृत हो चुकी थी। इन सहकारी समितियों का संचालन सीधे शासन द्वारा होता था और इन्हें आर्थिक सहायता भी शासन द्वारा दी जाती थी।

इन्दौर की होल्कर रियासत ने समय-समय पर इस बैंक की प्रगति में उल्लेखनीय योगदान दिया। 1938 में निमाड़ क्षेत्र के भ्रमण के दौरान महाराजा यशवंतराव होल्कर ने सहकारी आंदोलन के प्रति विशेष रूचि दिखलाई और बैंक द्वारा दिए गए सुझावों पर क्रियान्वयन करवाया। बैंक के सामने बहुत सी प्रतिकूल परिस्थितियाॅं आई, जिनसे निपटने के लिए बैंक ने अपने रिजर्व फंड में बढ़ोतरी की तथा अंशधारियों ने लगातार पांच वर्ष तक लाभांश नहीं लिया। मध्य भारत और इसके बाद मध्यप्रदेश के गठन और सहकारी कानूनों में हुए बदलाव के फलस्वरूप बैंक को अपना कार्यक्षेत्र कम कर केवल जिले तक सीमित करना पड़ा। बैंक ने आय के दूसरे दरवाजे तलाशे, सदस्यों से जहाॅं पूरा विश्वास और सहयोग प्राप्त किया, वहीं उन्हें अपने मुनाफे में से भरपूर हिस्सा भी दिया। प्रथम वर्ष में ही बैंक ने अपने सदस्यों को 9 प्रतिशत लाभांश वितरित किया था।

बैंक ने किसानों के हित में अपने विकास कार्यक्रम को आगे बढ़ाया और 1932-33 के अंत तक खरगोन, दतोदा तथा इन्दौर शहर (मल्हारगंज क्षेत्र) में अपनी शाखाओ खोली। सन् 1933-34 में बैंक ने गरोठ परगने के शामगढ़ कस्बे में तारण माल पर व्यवहार करने के लिए एजेंसी लाईन पर शाखा खोलकर एक स्थानीय बड़े व्यापारी को आननेरी एजेंट नियुक्त किया और वहाॅं 50 हजार रूपये तक का कारोबार करने की स्वीकृति दी गई ।

इधर सहकारी आंदोलन एवं सहकारी बैंक के कारोबार में अधिक गति एवं सक्षमता लाने के लिए बैंक का संचालक मंडल सदैव प्रयत्नशील रहा। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए बैंक के तत्कालीन असिस्टेंट मैनेजर श्री डब्ल्यू-टी-करम्बेलकर को बंबई, मद्रास एवं मैसूर के प्रांतीय सहकारी बैंक शाखाओं तथा मोटे रूप में वहाॅं के सहकारी आंदोलन का अध्ययन करने के लिए भेजा गया। इसी प्रकार बैंग्लोर में आयोजित आल इंडिया को-ऑपरेटिव बैंक्स एसोसिएशन की बैठक में बैंक की ओर से भाग लेने के लिए बैंक के मैनेजर रायरतन श्री ए-जी-शैलेकर तथा असिस्टेंट मैनेजर श्री डब्ल्यू-टी- करम्बेलकर को भेजा गया। सितंबर, 1937 के प्रथम सप्ताह में इंटरनेशनल को-ऑपरेटिव काँग्रेस पेरिस में बुलाई गई। एक प्रतिनिधि के रूप में बैंक के मैनेजर रायरतन श्री ए-जी-शैलेकर को चुना गया। बैंक ने इस गौरव को स्वीकार किया और श्री शैलेकर को महासभा की बैठक में भाग लेने हेतु पेरिस जाने तथा वहाॅं से यूरोप के अन्य देशों के सहकारी आंदोलन का निरीक्षण व अध्ययन करने हेतु जाने के लिए सम्पूण सुविधा प्रदान की गई।

आजादी के बाद सन् 1947-48 में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ और होल्कर रियासत व आसपास की दूसरी छोटी-बड़ी 23 रियासतें मिलाकर एक बड़ा राज्य बनाया गया, इसे ‘‘मध्य भारत‘‘ के नाम से संबोधित किया गया। इसके परिणम स्वरूप जिलों का पुर्नगठन किया गया। इस कारण बैंक को पूर्व होल्कर रियासत के कन्नोद व खातेगांव क्षेत्र का कारोबार देवास जिले की सहकारी बैंक और तराना तथा महिदपुर का कारोबार उज्जैन जिला सहकारी बैंक को सौंपना पड़ा। मध्यभारत बनने के बाद सन 1961 तक इस बैंक का कार्यक्षेत्र दो जिलों, इन्दौर एवं खरगोन में सीमित रहा। बाद में ‘‘एक जिला-एक बैंक‘‘ की नीति के अन्तर्गत खरगोन जिले की पश्चिम निमाड़ केन्द्रीय सहकारी बैंक को निमाड़ क्षेत्र की 3 शाखाओं का कारोबार हस्तांतरित कर दिया गया। बैंक की उल्लेखनीय प्रगति में सर्वश्री हरीशचन्दजी पाटिल, यू-पी-रायजादा, रामप्रसादजी दुबे, बापूसिंहजी म-डलोई, आनन्दरावजी जोशी, निर्भयसिंहजी पटेल, राधेश्यामजी शर्मा, रामेश्वरजी पटेल, कैलाशजी पाटीदार (बाबूजी), उमानाराय-ासिंह पटेल आदि ने बैंक के अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभाई।

बैंक के विकास में यहाॅं पर पदस्थ मानसेवी सचिवों श्री डी-जी-भालेराव, श्री शिवशंकरजी पटेल, श्री धन्नालालजी पटेल एवं श्री भगवतीप्रसादजी मिश्रा आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वर्ष 26-03-1971 से 30-01-1987 के बीच की अवधि में श्री मोहनलाल ज्ञानी ने प्रबन्ध संचालक का पद सुशोभित किया। श्री ज्ञानी 11 वर्ष तक प्रबन्धक एवं 16 वर्ष तक मैनेजिंग डायरेक्टर रहे। श्री ज्ञानी 16-11-71 से 08-11-73 तक की अवधि में रिजर्व बैंक के एग्रीकल्चर क्रेडिट डिपार्टमेंट में डेपुटेशन पर रहे। श्री ज्ञानी ने इस बैंक को सहकारी बैंकों की अगम पंक्ति में स्थान दिलाया। इसके बाद सर्वश्री आर-पी-विजयवर्गीय, असगर अली, एम-एल-पुरोहित, आर-के-मिश्रा, एस-बी-सि)की, डी-डी-वैष्णव, जी-एस- शर्मा, डाॅ-के-एन-त्रिपाठी, के-टी- सज्जन, एस-के-खरे, आलोक जैन आदि ने इस बैंक को अपने कौशल से मार्गदर्शन प्रदान किया।

वर्तमान में बैंक की 29 शाखाऐं हैं, जिसमें 19 कृषि शाखाऐं हैं तथा चार ए-टी-एम कार्यरत हैं। बैंक द्वारा आधुनिक बैंकिंग सुविधायें जैसे ए-टी-एम-कार्ड, केसीसी रूपे कार्ड, एन-ई-एफ-टी, आर-टी-जी-एस, ई-सी-एस, एस-एम-एस-अलर्ट, आई-एम-पी-एस, सी-टी-एस क्लीयरिंग, पाॅजिटिव पे एवं मोबाईल बैंकिंग की सुविधायें प्रदान की जा रही है। बैंक से सम्ब) सभी 120 कृषि संस्थाओं को कम्प्यूटरीकरण की महत्वाकांक्षी योजना पर बैंक कार्यरत है।

बैंक द्वारा कृषकों को कन्जम्प्शन ऋण, ट्रेक्टर ऋण, हार्वेस्टर ऋण, स्प्रींकलर ऋण, ड्रिप सिंचाई ऋण एवम् के-सी-सी-ऋण वितरण किया जा रहा है। इसी प्रकार अकृषि ऋण के रूप में बैंक द्वारा गृह निर्माण ऋण, मार्टगेज ऋण, चार पहिया, दो पहिया, व्यक्तिगत ऋण, प्लाट खरीदी ऋण, आभूषण तारण ऋण, व्यावसायिक केश क्रेडिट, फिशरमेन क्रेडिट कार्ड तथा डेयरी योजना ऋण प्रदान किया जा रहा है।